
मीना कुमारी जितनी उच्कोटी की अदाकारा थीं उतनी ही उच्कोटी की शयारा भी थीं उनकी ग़ज़लों और नज्मों को पढ़ कर ऐसा लगता है कि कोई नसों में चुपके -चुपके हजारों सुईयाँ चुभो रहा हो .गम के रिश्तों को उन्होंने जो जज्बाती शक्ल अपनी शायरी में दी,वह बहुत कम लोगो में मालूम होता है .उनकी निजी डायरियां से मशहूर लेखक और फिल्मकार गुलज़ार साहब ने कुछ चुनिंदे शे'रों , ग़ज़लों ,नज़मों ,को एक किताब "मीना कुमारी कीशायरी " के मध्यम से लोगों तक पहुचने का जो सरह्नियें कम किया है वह आभार का पत्र है .मीना जी के चाहने वाले बस यहीं कहेंगे
"न हाथ थम सके ,न पकड़ दमन ,
बड़े करीब से उठकर चला गया कोई "
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