जिंदगी यह है
सुबह से शाम तलक
दूसरे के लिए कुछ करना है
जिसमें ख़ुद अपना कोई नक़्श नहीं
रंग उस पैकरे -तस्वीर ही में भरना है
जिंदगी क्या है ,कभी कभी सोचने लगता है ये ज़हन
और फिर रूह पे छा जाते हैं
दर्द के साये ,उदासी का धुंवा ,दुख की घटा
दिल में रह -रह के ख्याल आता है
ज़िन्दगी ये है तो फिर मौत किसे कहते हैं ?
प्यार एक ख़्वाब इस ख़्वाब की ता'बीर न पूछ
क्या मिली जुर्म-वफ़ा की हमें ता'बीर न पूछ
सोमवार, 19 जनवरी 2009
गुरुवार, 1 जनवरी 2009
अमृता प्रीतम की याद में.....
जब मैं तेरा गीत लिखने लगी ...
मेरे शहर ने जब तेरे कदम छुएसितारों की मुठियाँ भरकर
आसमान ने निछावर कर दीं
दिल के घाट पर मेला जुड़ा ,
ज्यूँ रातें रेशम की परियां
पाँत बाँध कर आई......
जब मैं तेरा गीत लिखने लगी
काग़ज़ के उपर उभर आयीं
केसर की लकीरें
सूरज ने आज मेहंदी घोली
हथेलियों पर रंग गयी,
हमारी दोनो की तकदीरें
******************************************
रात कुडी ने दावत दी,
सितारों के चावल फाटक पर
यह डेग किसने चढा दी
चाँद की सुराही कौन लाया
चाँदनी की शराब पीकर
आकाश की आँखे गहरा गईं
धरती का दिल धड़क रहा है
सुना है आज टहनियों के घर
फूल मेहमान आए हैं.
आगे क्या लिखा है
अब इन तकदीरों से
कौन पूछने जाए
उम्र के काग़ज़ पर
तेरे इश्क का अंगूठा लगाया,
हिसाब कौन चुकाएगा !
किस्मत ने एक नगमा लिखा है
कहते हैं कोई आज रात
वही नगमा गाएगा
कल्प वृक्ष की छाव में बैठ कर
कामधेनु के छलके दूध से
किसने आज तक दोनी भारी !!
हवा की आहे कौन सुने,
चलूँ .........
तकदीर बुलाने आई है !!!!!!!!
शनिवार, 27 दिसंबर 2008
मीना जी की एक ग़ज़ल
आगाज़ तो होता है अंजाम नही होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नही होता
जब जुल्फ की कालिख में गम जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नही होता
हंस -हंस के जवां दिल के हम क्यूँ न चुने टुकड़े
हर शख्स की किस्मत में ईनाम नही होता
बहते हुए आंसू ने आंखों से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाये वो जाम नही होता
दिन डूबे है या डूबी है बारात लिए कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नही होता
शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008
"मीना कुमारी की शायरी "

मीना कुमारी जितनी उच्कोटी की अदाकारा थीं उतनी ही उच्कोटी की शयारा भी थीं उनकी ग़ज़लों और नज्मों को पढ़ कर ऐसा लगता है कि कोई नसों में चुपके -चुपके हजारों सुईयाँ चुभो रहा हो .गम के रिश्तों को उन्होंने जो जज्बाती शक्ल अपनी शायरी में दी,वह बहुत कम लोगो में मालूम होता है .उनकी निजी डायरियां से मशहूर लेखक और फिल्मकार गुलज़ार साहब ने कुछ चुनिंदे शे'रों , ग़ज़लों ,नज़मों ,को एक किताब "मीना कुमारी कीशायरी " के मध्यम से लोगों तक पहुचने का जो सरह्नियें कम किया है वह आभार का पत्र है .मीना जी के चाहने वाले बस यहीं कहेंगे
"न हाथ थम सके ,न पकड़ दमन ,
बड़े करीब से उठकर चला गया कोई "
सदस्यता लें
संदेश (Atom)